Monday, February 3, 2020

टल गया कूपमंडूकों का 'कुंभाभिषेकम'

File:Le temple de Brihadishwara (Tanjore, Inde) (14354574611).jpg
हमारे देश में तमिलनाडू में तंजावुर बृहदेश्वर मंदिर भारत के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। भोसले राजवंश सरफोजी राजे ने प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर में दुनिया का सबसे बड़ा शिलालेख उकेरा है। यह बृहदेश्वर मंदिर पहले चोल राजा ने बनवाया था। इसे राजाराजेश्वरम मंदिर या पेरुवुडैयार मंदिर भी कहा जाता है। कावेरी नदी के दक्षिणी तट पर स्थित यह मंदिर शिव को समर्पित है और द्रविड़ (दक्षिणी) वास्तुकला का अत्युत्तम उदाहरण है। इसे दक्षिण मेरू भी कहते है। तमिल राजा राजराजा चोल द्वारा ईसाई सन  1003 और 1010 के दौरान निर्मित इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी है। इस मंदिर का महाकुंभाभिषेकम समारोह अत्यंत पवित्रमाना माना जाता है। तमिलनाडु के साथ-साथ देश भर के भक्तों के लिए इस आयोजन का बहुत महत्व है। यह समारोह इस वर्ष 6 फरवरी को है। लेकिन इसी समारोह को कुछ संकुचित लोगों की नज़र लगी और भाषा का बहाना बनाकर उसे खट्टा करने का प्रयास हुआ। सौभाग्य से मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा विवेकपूर्ण भूमिका अपनाने के कारण यह मुद्दा आग पकड़ते-पकड़ते रह गया। एक मामूली विषय पर समाज गुटों में परिवर्तित होने का संकट टल गया।  
हिंदुओं के महान मंदिर तमिलनाडु की शान हैं (कुछ सबसे बड़े ईसाई चर्च भी तमिलनाडु में हैं )। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर नास्तिकों ने चाहे जितना भी परेशान किया हो, आज भी जनमानस पर इन मंदिरों का प्रभाव कायम है। देश के अन्य हिस्सों की तरह ही तमिलनाडु के मंदिरों में भी पूजा-अर्चना संस्कृत में होती थी। लगभग छह - सात दशकों पहले उपजे हुए द्रविड़ आंदोलन की दृष्टि में संस्कृत उत्तर भारत और अंततः आर्यों की भाषा है। इसलिए, द्रविड़वादियों का हठ था, कि संस्कृत या हिंदी का सभी स्तरों पर सफाया कर दिया जाना चाहिए और मंदिरों को भी इसमें शामिल किया गया। राज्य में कई मंदिर, विशेष रूप से सरकारी नियंत्रणवाले मंदिर, इसकी चपेट में आए और तमिल वहाँ दैनिक पूजा की भाषा बनी। हालांकि तंजावुर मंदिर जैसे मंदिर अपवाद बने रहे और इसका कारण यह है, कि इन मंदिरों का एक लंबा इतिहास है।
राजराजा चोल 
स्वयं तंजावुर मंदिर का इतिहास, जैसा कि ऊपर कहा गया है, कम से कम 1000  वर्ष पुराना है। चोल, चेर और पांड्य इन तमिल राजाओं का इतिहास गौरवमयी रहा है। ये सभी राजा संस्कृत को उदार प्रश्रय देनेवाले थे, यह यहाँ महत्वपूर्ण है। उनके तमिल अस्तित्व को संस्कृत से निकटता के कारण कोई बाधा नहीं पहुंची। इसलिए, उनके द्वारा बनाए गए मंदिर में संस्कृत मंत्रपठन की परंपरा कायम रही। वही परंपरा तथाकथित द्रविड़वादियों को चुभ रही थी। इसलिए किसी वकील ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर मांग की कि तंजावुर के इस समारोह में केवल तमिल भाषा में ही मंत्रपठन हो। इस मामले पर उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह निर्णय सुनाया। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि महाकुंभाभिषेकम के समारोह के दौरान, तमिल और संस्कृत दोनों भाषाओं के मंत्र कहे जाएं।
इसमें आनंददायक बात यह है, कि इस अवसर पर भाषा का बहाना बनाकर एक समुदाय में अलगाव पैदा करने का प्रयास असफल तो हुआ ही, साथ ही आम जनता से भी इन प्रयासों को समर्थन नहीं मिला। राज्य में विरोधी डीएमके पार्टी ने पहले 'केवल तमिल' की मांग की थी। उन्हें वाको जैसे नेताओं का समर्थन प्राप्त हुआ। दूसरी ओर, सत्ताधारी अन्ना द्रमुक पार्टी ने दोनों भाषाओं में मंत्रोच्चारण करने के पक्ष में मत दिया।
अब न्यायालय के आदेश के बाद भी नाम तमिळर कट्चि पार्टी के नेता सीमान जैसों ने 'अपनी ही सही' करने का पैंतरा लिया। दोनों भाषाओं में मंत्रोच्चारण अगर होना हो तो भी पहले मंत्रोच्चारण तमिल में ही हो, यह मांग उन्होंने की। हालांकि उसको समर्थन नहीं मिला। विद्वानों और सामान्य भक्तों ने इस ओर संकेत किया, कि इससे पहले महाकुंभाभिषेकम समारोह पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि के सत्ताकाल में (1997 में) हुआ था। उस अवसर पर इस मंदिर में वैदिक पंडितों की संस्कृत भाषा में मंत्रोच्चारण के साथ ही समारोह संपन्न हुआ था। करुणानिधि ने उसे रोका नहीं। चेन्नई मयिलाडुदुरै, रामेश्वरम, मदुरै  और कांचीपुरम जैसे प्रसिद्ध शिव मंदिरों में कुंभाभिषेकम संस्कृत भाषा में ही होता है। हिंदू परिवारों में भी जाप किया जाता है। इस पर कोई आपत्ति नहीं करता। पूजा और आरती के बाद तमिलनाडु में तिरुवासकम गाने की प्रथा है। यह स्तोत्र तमिल में ही।
परंपरावादियों की ओर से एक और तर्क रखा गया, कि तमिल भाषा के विकास का दावा करनेवाले सब लोग स्वयं बड़े हुए। दिनमलर नामक समाचारपत्र में प्रकाशित एक लेख में कहा है, कि मस्जिदों में अरबी में प्रार्थना होती है और चर्च में अंग्रेजी प्रार्थना होती है। वहां जाकर कहो, 'तमिल में उपासना करो'। यह कुंभ समारोह आगम शास्त्र के अनुसार होता है। इसमें पूजा कैसे हो और किस प्रकार की हो, इसका मार्गदर्शन है। मंदिरों में हजारों वर्षों से इसी के अनुसार पूजा की जाती है। एक बात हमें समझनी चाहिए, कि पूजा पद्धति और उपासना अलग-अलग हैं। दि. वे. चंद्रशेखर शिवाचार्यर नामक पंडित ने मत व्यक्त किया है, कि हम परमेश्वर की उपासना करते है वह किसी भी भाषा में हो सकती है। लेकिन पूजा पद्धति के कुछ नियम है और उनका पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने यह जानकारी भी दी है, कि जिन लोग को मंदिर में तमिल में पूजा करना चाहते हैं उनके लिए पूजारी को तमिल में पूजा करवाने का नियम है। लेकिन 99% लोग तमिल में पूजा करने के लिए नहीं कहते हैं; वे संस्कृत की मांग करते है।
संस्कृत की ओर से मत रखनेवालों की एक और आपत्ति है, कि बृहदेश्वर मंदिर में तमिल को सम्मान मिलें इसके लिए कमर कसनेवाले सारे लोग नास्तिक है। तमिल के लिए मैदान में उतरनेवाले सारे लोग भगवान को नकारनेवाले हैं। लोग ईश्वर में विश्वास करते हैं और भाषा उनका अधिकार है। लेकिन इन दोनों को रौंदकर ये लोग अपनी ही सही करवाने का प्रयास कर रहे हैं। इस का मतलब है, कुछ नेता और प्रसिद्धी के लिए बेताब होनेवाले कुछ तमिल आंदोलक तिल का ताड़ बना रहे है। 
उच्च न्यायालय ने इस विवाद को चाय की प्याली में उभरा हुआ तूफान बना  दिया। लेकिन इससे एक और बात स्पष्ट होती है। वह है क्षेत्रीय सीमाओं को पार करने की संस्कृत की शक्ति। चोल राजराजा प्रथम वास्तव में सम्राट थे। उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों, श्रीलंका, मालदीव और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों पर उसने सन 985 और 1014 के बीच शासन किया। राजराजा चोल ने जब बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण किया, तो उसका राज्य वर्तमान तमिलनाडु, केरल, आंध्र, कर्नाटक और ओडिशा तक फैला था। उसके पुत्र राजेंद्र चोल ने तो बंगाल में भी अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। यानी यह राजा केवल तमिल लोगों पर नहीं बल्कि करोड़ों गैर – तमिल लोगों पर राज्य करता था। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इन सबसे संवाद करने के लिए चोल राजाओं को संस्कृत भाषा सही लगी! एक तरह से संस्कृत उनके लिए राष्ट्रीय भाषा थी और इसलिए उनके समय से ही इस मंदिर में संस्कृत मंत्रपठन जारी है। न्यायालय ने इस मामले का संज्ञान लिया और तमिल की गरिमा को ध्यान में रखते हुए दोनों भाषाओं में समारोह करने की अनुमति दी। इस बहाने कूपमंडूकों का कुंभाभिषेकम तो टल गया, इतना काफी है!

Sunday, December 29, 2019

Rahul, the Saviour

The Bharatiya Janata Party is a lucky party. Whenever it is in dumps, a distinguished adversary comes to its rescue and makes matters so much easy for the saffron camp. Rahul's latest remarks have done the magic yet again for BJP and provided a perfect release valve for the party to duck some nagging questions that could have haunted it. 
The BJP was in a precarious situation after the drubbing it received in Jharkhand. This was third straight failure for the party after it romped home to a thumping majority to the power at centre just six months ago. The defeat came on the heels of heat generated by Citizenship Amendment Act (CAA). There was unarguably a backlash against the CAA and a huge propaganda that succeeded pushing the ruling party in corner. Just as BJP had its back to the wall, came the 'masterstroke' by Gandhi scion Rahul.
With his yet another comment, completely idiotic and utterly misguided, Rahul Gandhi has managed to destruct the well-built narrative of secular camp. The focus of the debate will now shift from the issues of governance and policy to the ideology. The BJP couldn't ask for more as it, as well as its ideological powerhouse Rashtriya Swayamsevak Sangh, are saddled firmly in their thought processes. The lacuna on this count is in the Congress camp. The main opposition party is oscillating between different principles - sometimes it is epitome of secularism and on another occasion, it is acute followers of Hinduism embarking, at times, on pilgrimage to Manasarovar. Thus, Congress under Rahul has failed in establishing any credentials for ideology and as such, become a laughing stock when he or his team members take pot-shots at an organization which has stood firmly on its principles for over nine decades. Notwithstanding Rahul's folly of targeting RSS for its uniform and especially chaddi (nicker), after the organization has abandoned it long ago, his jibe falls flat on face of itself. 
"Assam will not run by Nagpur," Rahul said with a manufactured bravado. “We (Congress) won’t allow BJP and RSS to attack Assam’s history, language and culture. Assam cannot be let to run from Nagpur by RSS. Assam will be run by the people of Assam, right from here,” he said, while addressing a gathering of Congress workers in Guwahati. 
 Little did he realize or heed to the obvious fact that Nagpur is in India, not somewhere else on earth. Even if the rulers of Assam draw inspiration from Nagpur, as they do, they a do not commit any wrong. When the earlier government of the state was run by Congress, where did it took dictation from? Italy? Funnily enough, even as Rahul decried BJP for implementing RSS' agenda and taking notes from Nagpur, he himself doesn’t gives any clear indication of the source of his ideological inspiration. He runs to unknown, undeclared and untraceable destinations a number of times in a year, sometimes coinciding with critical situations in the country, and comes invigorated to pursue his politics of comfort. Someone with such a bad record of ideological mooring should at least refrain from commenting on others' footings.

Monday, March 18, 2019

BJP Manages a Respite, But for How Long?

The Bharatiya Janata Party has managed to name a leader as the new chief minister of Goa. This must come as a big respite to the party still recovering from the loss of Manohar Parrikar. However, given the wafer thin majority the party enjoys in the state, it will be a herculean task for the party to continue in the saddle for long.


Pramod Sawant willl be the new CM of Goa, BJP signalled on Monday. Two MLAs from the BJP alliance partners will be made deputy chief ministers as part of the compromise reached with allies, according to the party sources.


Manohar Parrikar died Sunday after a prolonged illness and suffering from pancreas cancer. The tiny state of Goa witnessed a deadlock as the demise of Parrikar left a big void in the state politics. However, the party managed to break the ice by offering key allies their pound of flesh and accepting their demand for deputy CM's posts. Sawant, 45 years old,  is currently the Speaker of Goa Legislative Assembly.


There are strong indications that the two would-be Dy CMs are Goa Forward Party chief Vijai Sardesai and MGP MLA Sudin Dhavalikar. "We have managed to convince the alliance partners and finalised the formula of two deputy chief ministers for the state, a senior BJP functionary told PTI.


Senior BJP leader and Union Minister Nitin Gadkari held marathon discussions with his party MLAs and alliance partner regional parties such as Maharastrawadi Gomantak Party (MGP) and Goa Forward Party to choose the successor of Parrikar. He had told the reporters in Panaji that a decision would be announced soon. BJP national secretary B L Santosh is also helping him. Gadkari, along with BJP president Amit Shah, held a series of meetings with party MLAs and also of coalition partners to pick a new CM.
The BJP-led Goa government is supported by Maharashtrawadi Gomantak Party (MGP), Goa Forward Party (GFP), independents and the Nationalist Congress Party (NCP).


Following the demise of Manohar Parrikar, the strength of the Goa assembly reduced to 36 members. In the 40-member house, three seats had earlier fallen vacant following the resignation of Congress MLAs Dayanand Sopte and Subhash Shirodkar, and death of BJP MLA Francis D’Souza. By-polls to these three constituencies are scheduled alongside Lok Sabha elections on April 23rd. Currently, the BJP has 12 MLAs in the house, while the Congress has 14. The Congress has already staked claim for the formation of the government. The party leaders met Governor Mrudula Sinha and handed her letter of support. 


Thus, even if the BJP manages to install Sawant as CM, he will still face constant threat of being dismantled by opposition Congress and dissidents. Therefore, the drama will only get interesting in coming days.

Saturday, March 16, 2019

नाकारों के नकारों पर सवार कांग्रेस

कहते हैं, कि जो लोग अपनी गलती से सीखते है वे साधारण होते है। जो दूसरों की गलतियों से सीखते है वे बुद्धिमान होते है लेकिन जो ना अपनी और ना दूसरों की गलतियों से सीखते है वे मूर्ख होते है। कांग्रेस पार्टी का हाल कुछ इस तीसरे वर्ग के लोगों जैसा है। अपनी पुरानी शिकस्तों और वर्तमान राजनीतिक सूझबूझ से वह कुछ भी सीखने के लिए तैयार नहीं है।
एक तरफ कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने की बात करती है जबकि अपने इस लक्ष्य के लिए दूसरी पार्टियों को साथ लेने के लिए वह तैयार नहीं है! सारे राजनीतिक विश्लेषक एक सूर में यह कहते हैं, कि कांग्रेस का अहंकार उसको डुबानेवाला है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी में बिठाने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ता इतने लालायित है कि उसके लिए पूरी तैयारी करने की भी तैयारी में नहीं दिखा रहे। जंग में जीतने का उनको इतना विश्वास है कि जंग की तैयारी करना वे ज़रूरी नहीं समझते।


शुक्रवार को कांग्रेस ने कहा कि पश्चिम बंगाल सहित जिन राज्यों में गठबंधन को लेकर प्रयास हो रहे हैं, वहां किसी तरह की समस्या नहीं है। पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने यह भी कहा, कि विपक्षी दलों का मकसद प्रधानमंत्री मोदी को हटाना नहीं बल्कि देश को बचाना है।


उन्होंने बताया कि, ‘‘हमारा मकसद मोदी जी को हटाना नहीं है। हमारा मकसद देश को बचाना है, संस्थाओं को बचाना है। सबकी स्वतंत्रता को बचाना है। जिस व्यक्ति विशेष को लेकर भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव को व्यक्तिवाद का चुनाव बनाना चाहती है, उस व्यक्ति में ही कोई विशेषता लोगों को नहीं दिखती, तो वो कैसा व्यक्ति विशेष है? ’’


खेड़ा ने कहा, ‘‘ये बड़ा स्पष्ट है कि जहां भी हमारी गठबंधन की बात चल रही है, जिन राज्यों में चल रही है, कहीं कोई समस्या नहीं है, बातचीत चल रही है, बातचीत में जितना समय लगता है, उतना लगता है।’’


इस पूरे कथन को पढ़ने के बाद दो बातें पूरी तरह से समझ आती है। एक तो कांग्रेस में नाकारे नेताओं की भरमार है जिनका अपना कोई जनाधार नहीं है। दूसरी बात यह, की ज़मीनी सच्चाई स्वीकार करने की मानसिकता इन नेताओं में अभी भी नहीं है। अगर भाजपा का प्रचार व्यक्ति विशेष (नरेंद्र मोदी) को केंद्र में रखकर है तो कांग्रेस कहां लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वाह कर रही है। बल्कि वहां तो पार्टी का पूरा खाका ही एक परिवार विशेष पर खड़ा है। मोदी ने 12 वर्ष गुजरात में और पांच वर्ष केंद्र में सरकार चलाते हुए अपना सिक्का चलाया है। तब जाकर भाजपा ने उन्हें अपना नेता बनाया है। राहुल गांधी ने अब तक किया क्या है जिसके बूते कांग्रेस उन्हें अपना मसीहा मानती है?


रही बात गठबंधन की, तो राजनीति पर थोड़ी सी भी नजर रखने वाले किसी भी निरीक्षक से पूछिए। वह आपको बताएगा कि कांग्रेस का गठबंधन का हर प्रयास विफल रहा है। पिछले वर्ष मई महीने में कर्नाटक में अधिक सीटें मिलने के बाद भी कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष जनता दल को मुख्यमंत्री पद देकर उदारता दिखाई थी। देश में मोदीविरोधी लगभग हर नेता उस अवसर पर उपस्थित था और तथाकथित सेकुलर दलों के नेताओं द्वारा उठाए गए हाथों की वह तस्वीर अभी भी लोगों के मन से हटी नहीं है। हालांकि उस तस्वीर से उभरी हुई आशाएं एक वर्ष के भीतर ही धूमिल हो चुकी है क्योंकि उस वक्त कांग्रेस ने जो सूझबूझ दिखाई थी आज उसका नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। इसी का कारण है, कि हर नेता, हर कुनबा, हर खेमा और हर पार्टी कांग्रेस से खफा है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कांग्रेस से गठबंधन करने में बिल्कुल रुचि नहीं रखती। बल्कि उन्होंने तो राज्य में सभी चुनाव क्षेत्रों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गठबंधन के लिए कांग्रेस से गुहार कर कर के थक गए लेकिन कांग्रेस ने उन्हें घास नहीं डाली। बिहार में अगर कांग्रेस राजद से गठबंधन कर भी लेती है तो भी उसका कितना असर होगा यह भगवान ही जाने क्योंकि राजद प्रमुख लालू यादव इस वक्त जेल में है। कर्नाटक में जिस गाजेबाजे के साथ कांग्रेस ने जेडीएस से गठबंधन किया था वह उत्साह नदारद है क्योंकि वहां जेडीएस अपने कुनबे में लगी आग को बुझाने में व्यस्त है। देवेगौडा परिवार अंदरूनी झगड़ों से परेशान है। ऊपर से पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की महत्वाकांक्षा इस गठबंधन को कमजोर करने में लगी हुई है। आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस से गठबंधन कर के तेलंगाना के विधानसभा चुनाव लड़े थे लेकिन वहां इस गठबंधन को मुंह की खानी पड़ी जिसके कारण नायडू भी कांग्रेस से नजदीकी बढ़ाने में ज्यादा रस लेते हुए नहीं दिखते। हालांकि तमिलनाडु में डीएमके के साथ हाथ मिलाने में कांग्रेस को थोड़ी बहुत सफलता मिली है और इसी सफलता पर पार्टी इतरा रही है।


एक पूरी पार्टी की पार्टी एक ही परिवार पर निर्भर हो और जनाधार रखने वाले नेताओं का अकाल हो तो वास्तविकता को नकारनेवाले नेताओं की तूती तो बोलेगी ही। ऐसे नकारों पर सवार कांग्रेस की नैया डूबना तय है।

Thursday, March 14, 2019

NCP's List of Candidates Adds to Conundrum

The Nationalist Congress Party (NCP) which is struggling to overcome the internal bickering has released its first list of 12 candidates, including eleven from Maharashtra and one from Lakshadweep. However, the list has only added to the conundrum after NCP workers were distraught by the Pawar family's feud.


The prominent names in the list are former state Irrigation Minister Sunil Tatkare, who would be contesting from Raigad, former state minister Gulabrao Devkar from Jalgaon, NCP supremo Sharad Pawar’s daughter and sitting MP Supriya Sule from Baramati, Udyan Raje Bhosale from Satara and Anand Paranjpe from Thane.


The party said the next list of candidates will be declared in the next couple of days. It has, however, desisted from announcing the candidate for contentious Ahmednagar seat. The party has not announced candidate from the Hathkanangale seat in south Maharashtra thereby leaving it for its alliance partner Swabhimani Shetkari Sanghatana.


The NCP has also not announced the candidature for Maval and Madha seats which have garnered attention from all quarters because of the family feud being staged for the candidacy from these constituencies.


NCP Chief Sharad Pawar’s nephew and former Deputy Chief Minister of Maharashtra Ajit Pawar has put his foot down to field his on Parth from Maval.


Sharad Pawar, the doyen of the Maharashtra politics was likely to contest from Madha. However, he pulled himself out from the ring at the last minute leaving the party workers in disarray. Pawar had announced last time that he would not contest the Lok Sabha election and instead chose the Rajya Sabha way. However, he had said that party workers wanted him to contest from Madha constituency in Solapur district, currently represented by NCP leader Vijaysinh Mohite Patil.


The 78-year-old, who completed five decades in politics two years ago, announced that since two members of his family were going to contest the polls, "somebody had to step back." "Since I have already won elections 14 times, I decided not to contest the poll (this time)," he told reporters after holding a meeting with party leaders on Monday.





These frequent somersaults from the veteran leader has left the observers gaping in awe as Pawar is known for political acumen and apt decision making.


Not surprisingly, ruling BJP was forthcoming in attacking his stance. Maharashtra Chief Minister Devendra Fadnavis said the NCP chief's decision to pull out from poll fray was because he had "sensed the change in the air".

Tuesday, March 12, 2019

Priyanka Slams Narendra Modi - An Honest Rendering of a Borrowed Script

Congress general secretary Priyanka Gandhi Vadra on Tuesday opened her account in the election camapgin by targetting the Narendra Modi government or just Namo. She alleged the the National Democratic Alliance government failed to fulfill promises and destructed institutions. All this was honest to the script run by the Congress party and one must admit that she adopted to the script very well.


Priyanka Gandhi was recently appointed as the Congress general secretary in early February and this was her first first political rally after assuming charge of the office. Obviously enough, there was much curiosity abound her appearance and the hallowed 'similarity' to her grandmother Indira Gandhi.


Congress president Rahul Gandhi and UPA chairperson Sonia Gandhi were present at the rally near Adalaj village of Gandhinagar district.


She exhorted the people to be vigilant, treat their vote as a "weapon" and ask right questions. "Our institutions are being destroyed. Wherever you see, hatred is being spread. Nothing matters more to us that you and I protect this nation, work for it and move forward together," the Congress leader said.


Earlier in the day, a meeting of the the party's highest decision-making body Congress Working Committee (CWC) was also held and Priyanka also attended the meeting for the first time.





It was quite perplexing that Priyanka said that she was appalled at the country's situation today. This sounds very phony for someone who has chosen to remain in slumber for over two decades and repetedly denying any interest in politics. It also becomes laughable when one looks at the pathetic condition her party is in. obviously, Priyanka must be worried about the situation of her party rather than the country because it is the former that is in predicament right now.


The country is doing fine!

Friday, March 8, 2019

Ayodhya Verdict - Another Tactic to Delay the Inevitable?

That the Supreme Court on Friday referred Ram Janmabhoomi-Babri Masjid land dispute case pertaining to Ayodhya to mediation for amicable settlement reeks of another attempt to delay the inevitable. The court has to give one or another verdict howsoever it may try to evade from its responsibility.


Former apex court judge Justice (retd) F. M. Kallifulla will head a panel of mediators in the case. Other members of the panel of mediators include spiritual guru Shri Shri Ravi Shankar and senior advocate Sriram Panchu. Fortunately enough, the apex court has accepted that the case was not just about property but, also about sentiment and faith.


The SC has said that proceedings in the case will be held in Faizabad and process to start within a week. The SC has asked the panel of mediators to complete its mediation process within eight weeks and file a progress report of the mediation proceedings within four weeks.


Court also said that panel of mediators may co-opt more members and in case of any difficulty, they can inform the SC registry. The court directed in camera proceedings of mediation in Ayodhya case and restrained media - both print and electronic - from reporting the proceedings of mediation case.


A five-judge Constitution Bench headed by Chief Justice Ranjan Gogoi on Wednesday had reserved the order after hearing various contesting parties. Fourteen appeals have been filed in the apex court against the 2010 Allahabad High Court judgment, delivered in four civil suits, that the 2.77-acre land in Ayodhya be partitioned equally among the three parties -- the Sunni Waqf Board, the Nirmohi Akhara and Ram Lala.





The constant postponing of the matter, sometimes even refusal by the SC to hear any plea, has created a sort of discontent among the Hindus. It seems that the SC simply does not want the case to reach to its logical conclusion lest any political party gets mileage from it. It is pertinent here to remember Congress leader Kapil Sibal's famous statement where he requested the SC to postpone the hearing of the case till Lok Sabha elections this year are over.


It has been a long wait for Hindus in India to get to see a grand temple to their beloved deity being built on the same site where Shri Rama was born. It is also worth mentioning here that in an interview to a news agency, Modi had said in January this year that a decision on bringing an ordinance on Ram Temple can be taken after the judicial process is complete. The BJP had passed a resolution for the construction of a grand Ram Temple in Ayodhya at Palampur in 1989. The party is pursuing the issue ever since and there is tremendous pressure from Rashtriya Swayamsevak Sangh to get the issue resolved as early as possible. RSS expects Modi government to fulfil its promise of building the Ram temple within this tenure as the BJP was elected to power in 2014 after committing itself to do so.


In this scenario, even though this has raised the hope for a decision on the long pending case in a stipulated time frame, that possibility still remains a pipe dream because no result from this mediation exercise is guaranteed. So as of now, it seems that all this mediation thing is just a ploy for buying some time till elections are announced. Once the announcement of poll schedule takes place, the government's hands will be tied and one may expect any further development only thereafter. That is quite a smart move!