Sunday, April 19, 2020

किमान साधूंचे तरी श्राप घेऊ नका

गोष्ट आहे ९ नोव्हेंबर १९६६ ची. देशभरातील साधू आणि संत दिल्लीतील संसद भवनाबाहेर जमले होते. ब्रिटिश काळापासून चालू असलेली गोहत्येची प्रथा बंद व्हावी अशी त्यांची मागणी होती. तशी ही मागणी जुनीच होती. परंतु 'विज्ञान'वादाचा टेंभा मिरवणाऱ्या नेहरूंच्या काळात ही मागणी पूर्ण होणे शक्यच नव्हते. मात्र फेब्रुवारी महिन्यात सत्तेवर आलेल्या इंदिरा गांधी यांनी गोवधबंदीचा कायदा करण्याचे वचन देऊनच सत्ता हातात घेतली होती. त्यामुळे त्यांच्याकडून न्याय मिळेल अशी साधूंचा अपेक्षा होती. 
सत्तेवर आल्यानंतर मात्र इंदिराजींनी या मागणीला वाटाण्याच्या अक्षता लावल्या. त्यामुळे साधू समाज संतप्त झाला होता. संसदेचे अधिवेशन सुरु होते. त्यामुळे सगळे साधू तिथे जमा झाले होते. हा कायदा झाला नाही तर संसदेला घेराव घालण्याचा इशारा त्यांनी दिला होता. या साधूंचे नेतृत्व करत होते करपात्री महाराज. प्रत्यक्षात इंदिराजींच्या आदेशावरून या साधूंवर गोळ्या झाडण्यात आल्या. त्यात अनेक साधू मारले गेले (सरकारी आकडा ८) तर शेकडो जखमी झाले. संसद भवानाबाहेरचा रस्ता जखमी साधू आणि मृतदेहांनी भरून गेला होता. हा प्रकार इतका भयंकर होता, की गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा यांनी राजीनामा दिला. 
त्या दिवशी तिथी होती गोपाष्टमी. या दिवशी गाईंची पूजा करण्यात येते.
त्या साधूंचे मृतदेह उचलता उचलता करपात्री महाराजांनी इंदिरा गांधींना शाप दिला, "या साधूंची शरीरे जशी छिन्नविछिन्न झाली तसाच तुझा होईल. तुझा निर्वंश होईल आणि तो गोपाष्टमीलाच होईल." त्यानंतर १४ वर्षांनी संजय गांधीचा अपघाती मृत्यू झाला. तिथी होती दशमीची. त्यानंतर चार वर्षांनी खुद्द इंदिराजींची हत्या झाली. त्यादिवशी तिथी होती गोपाष्टमी. नंतर सात वर्षांनी राजीव गांधी यांची हत्या झाली. त्याही दिवशी तिथी होती अष्टमीची. करपात्री महाराज म्हणाले तसंच घडलं - संजय गांधी, इंदिरा गांधी आणि राजीव गांधी या तिघांचेही मृतदेह छिन्नविछिन्न अवस्थेतच होते. विमान अपघातात संजय गांधी गेले, इंदिराजींच्या शरीराची चाळणी झाली आणि बॉम्बस्फोटात राजीवजींच्या शरीराचे शतशः तुकडे झाले. 
हे सगळं सांगण्याचं कारण म्हणजे काल उघडकीला आलेली महंतांच्या हत्येची घटना. दोन साधू आणि त्यांच्या ड्रायव्हरला सुमारे 100-200 लोकांनी जीवे मारल्याची घटना काही दिवसांपूर्वी पालघरमध्ये घडली होती. या मारहाणीचा व्हिडिओ रविवारी सोशल मीडियावर व्हायरल झाला. गुरुवारी रात्री गडचिंचले येथे ही घटना घडली. आणखी भयानक म्हणजे खुद्द पोलिसांनीच या साधूंना जमावाच्या ताब्यात दिलेले दिसते. कोरोनाच्या संकटाच्या हाताळणीमुळे आधीच वस्त्रहरण झालेल्या महाराष्ट्र सरकारवर यामुळे टिकेचा पुन्हा मारा झाला तर नवल नाही. 
भाजपला टांग मारून उध्दव ठाकरे यांनी सत्ता हस्तगत केली खरी, पण सत्ता राबवायची कशी यावरून त्यांची गोची झालेली साफ दिसते. गोएथेच्या 'फाउस्ट'मध्ये कथानायक ज्याप्रमाणे आपला आत्मा विकायला काढतो, तशी काहीशी गत ठाकरे व शिवसेनेची झालेली दिसते. फाउस्ट अत्यंत हुशार असतो, परंतु स्वतःच्या जीवनाबद्दल तो असमाधानी असतो. मग तो सैतानाशी समझोता करतो आणि स्वतःचा आत्मा विकतो. शिवसेनेने तेच केलेलं दिसतंय. 
ख्रिस्ती प्रसारक काँग्रेस आणि जेहादी राष्ट्रवादी काँग्रेसची भूते त्यांना हवं ते करत आहेत. राज्याच्या सत्तेच्या बदल्यात उद्धवनी त्यांना मोकळे रान दिल्यासारखं दिसतंय. आधीच उल्हास त्यात फाल्गुन मास या न्यायाने कोरोनाचं संकट येऊन कोसळलं. राज्याचा कारभार कसा चालवावा हा वेगळा प्रश्न. त्यात मत मतांतरे होण्याची शक्यता भरपूर. त्यामुळे त्यात जायला नको. पण किमान माणसाच्या जीवाची तरी शाश्वती मिळावी, त्यात कुठल्या मानवी आगळीकीमुळे विघ्न येता कामा नये...इतकी अपेक्षा करणं फारसे वावगे म्हणता येणार नाही. दुर्दैवाने हीच शाश्वती आज राहिलेली नाही. शाश्वती जाऊ द्या, मुळात सरकारचीच भीती वाटायला लागलीय. सरकारचे मंत्रीच गुंडाचा डबल रोल करतायत. दिवसाढवळ्या लोकांना उचलून नेले जातेय, साधूंना पोलीस स्वतःच गुंडाचा हातात सोपवत आहेत...जी जी म्हणून जंगल राजची लक्षणे ऐकली होती ती प्रत्यक्षात येताना दिसताहेत. 
महाराष्ट्रातल्या किमान दोन पिढ्यांनी बाळासाहेब ठाकरेंचे विचार ऐकून आपली राजकीय मते बनविली आहेत. यापैकी बहुतांश लोक अजून हयात आहेत आणि बाळासाहेबांच्या मुलाच्या कारकिर्दीत त्यांच्याच विचाराची शकलं उडावीत, हे त्यांच्या मनाला आणखी घरे पाडणारी गोष्ट आहे. चार पाच दशके बाळासाहेबांनी जे 'विचाराचे सोने' दिले, ते असे मोडीत काढताना पाहून त्यांना जास्त वेदना होतात. उध्दव यांना टेकू देणाऱ्यांची कदाचित तीच इच्छा असावी. तरीही ज्या राज्यात साधूंच्या जीवाची खात्री नसते ते राज्य कधीही चांगले असू शकत नाही. आज नाही तरी अगदी अलीकडेपर्यंत शिवसेना हिंदुत्वाची जपमाळ ओढत होती. त्याच हिंदुत्वाचे दोन पूज्य व्यक्तिमत्व धर्ममाफियांच्या गुंडगिरीला बळी पडले आहेत. परोपकाराय सतां विभूतयः या न्यायाने ते काही बोलणार नाहीत, पण त्यांच्यावर श्रद्धा असणारे तेवढेच क्षमाशील असतील, असे नाही. त्यांच्यामधून कोणी करपत्री महाराज उभे करून घेऊ नका...किमान साधूंचे तरी श्राप घेऊ नका! 
देविदास देशपांडे

Monday, February 3, 2020

टल गया कूपमंडूकों का 'कुंभाभिषेकम'

File:Le temple de Brihadishwara (Tanjore, Inde) (14354574611).jpg
हमारे देश में तमिलनाडू में तंजावुर बृहदेश्वर मंदिर भारत के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। भोसले राजवंश सरफोजी राजे ने प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर में दुनिया का सबसे बड़ा शिलालेख उकेरा है। यह बृहदेश्वर मंदिर पहले चोल राजा ने बनवाया था। इसे राजाराजेश्वरम मंदिर या पेरुवुडैयार मंदिर भी कहा जाता है। कावेरी नदी के दक्षिणी तट पर स्थित यह मंदिर शिव को समर्पित है और द्रविड़ (दक्षिणी) वास्तुकला का अत्युत्तम उदाहरण है। इसे दक्षिण मेरू भी कहते है। तमिल राजा राजराजा चोल द्वारा ईसाई सन  1003 और 1010 के दौरान निर्मित इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी है। इस मंदिर का महाकुंभाभिषेकम समारोह अत्यंत पवित्रमाना माना जाता है। तमिलनाडु के साथ-साथ देश भर के भक्तों के लिए इस आयोजन का बहुत महत्व है। यह समारोह इस वर्ष 6 फरवरी को है। लेकिन इसी समारोह को कुछ संकुचित लोगों की नज़र लगी और भाषा का बहाना बनाकर उसे खट्टा करने का प्रयास हुआ। सौभाग्य से मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा विवेकपूर्ण भूमिका अपनाने के कारण यह मुद्दा आग पकड़ते-पकड़ते रह गया। एक मामूली विषय पर समाज गुटों में परिवर्तित होने का संकट टल गया।  
हिंदुओं के महान मंदिर तमिलनाडु की शान हैं (कुछ सबसे बड़े ईसाई चर्च भी तमिलनाडु में हैं )। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर नास्तिकों ने चाहे जितना भी परेशान किया हो, आज भी जनमानस पर इन मंदिरों का प्रभाव कायम है। देश के अन्य हिस्सों की तरह ही तमिलनाडु के मंदिरों में भी पूजा-अर्चना संस्कृत में होती थी। लगभग छह - सात दशकों पहले उपजे हुए द्रविड़ आंदोलन की दृष्टि में संस्कृत उत्तर भारत और अंततः आर्यों की भाषा है। इसलिए, द्रविड़वादियों का हठ था, कि संस्कृत या हिंदी का सभी स्तरों पर सफाया कर दिया जाना चाहिए और मंदिरों को भी इसमें शामिल किया गया। राज्य में कई मंदिर, विशेष रूप से सरकारी नियंत्रणवाले मंदिर, इसकी चपेट में आए और तमिल वहाँ दैनिक पूजा की भाषा बनी। हालांकि तंजावुर मंदिर जैसे मंदिर अपवाद बने रहे और इसका कारण यह है, कि इन मंदिरों का एक लंबा इतिहास है।
राजराजा चोल 
स्वयं तंजावुर मंदिर का इतिहास, जैसा कि ऊपर कहा गया है, कम से कम 1000  वर्ष पुराना है। चोल, चेर और पांड्य इन तमिल राजाओं का इतिहास गौरवमयी रहा है। ये सभी राजा संस्कृत को उदार प्रश्रय देनेवाले थे, यह यहाँ महत्वपूर्ण है। उनके तमिल अस्तित्व को संस्कृत से निकटता के कारण कोई बाधा नहीं पहुंची। इसलिए, उनके द्वारा बनाए गए मंदिर में संस्कृत मंत्रपठन की परंपरा कायम रही। वही परंपरा तथाकथित द्रविड़वादियों को चुभ रही थी। इसलिए किसी वकील ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर मांग की कि तंजावुर के इस समारोह में केवल तमिल भाषा में ही मंत्रपठन हो। इस मामले पर उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह निर्णय सुनाया। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि महाकुंभाभिषेकम के समारोह के दौरान, तमिल और संस्कृत दोनों भाषाओं के मंत्र कहे जाएं।
इसमें आनंददायक बात यह है, कि इस अवसर पर भाषा का बहाना बनाकर एक समुदाय में अलगाव पैदा करने का प्रयास असफल तो हुआ ही, साथ ही आम जनता से भी इन प्रयासों को समर्थन नहीं मिला। राज्य में विरोधी डीएमके पार्टी ने पहले 'केवल तमिल' की मांग की थी। उन्हें वाको जैसे नेताओं का समर्थन प्राप्त हुआ। दूसरी ओर, सत्ताधारी अन्ना द्रमुक पार्टी ने दोनों भाषाओं में मंत्रोच्चारण करने के पक्ष में मत दिया।
अब न्यायालय के आदेश के बाद भी नाम तमिळर कट्चि पार्टी के नेता सीमान जैसों ने 'अपनी ही सही' करने का पैंतरा लिया। दोनों भाषाओं में मंत्रोच्चारण अगर होना हो तो भी पहले मंत्रोच्चारण तमिल में ही हो, यह मांग उन्होंने की। हालांकि उसको समर्थन नहीं मिला। विद्वानों और सामान्य भक्तों ने इस ओर संकेत किया, कि इससे पहले महाकुंभाभिषेकम समारोह पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि के सत्ताकाल में (1997 में) हुआ था। उस अवसर पर इस मंदिर में वैदिक पंडितों की संस्कृत भाषा में मंत्रोच्चारण के साथ ही समारोह संपन्न हुआ था। करुणानिधि ने उसे रोका नहीं। चेन्नई मयिलाडुदुरै, रामेश्वरम, मदुरै  और कांचीपुरम जैसे प्रसिद्ध शिव मंदिरों में कुंभाभिषेकम संस्कृत भाषा में ही होता है। हिंदू परिवारों में भी जाप किया जाता है। इस पर कोई आपत्ति नहीं करता। पूजा और आरती के बाद तमिलनाडु में तिरुवासकम गाने की प्रथा है। यह स्तोत्र तमिल में ही।
परंपरावादियों की ओर से एक और तर्क रखा गया, कि तमिल भाषा के विकास का दावा करनेवाले सब लोग स्वयं बड़े हुए। दिनमलर नामक समाचारपत्र में प्रकाशित एक लेख में कहा है, कि मस्जिदों में अरबी में प्रार्थना होती है और चर्च में अंग्रेजी प्रार्थना होती है। वहां जाकर कहो, 'तमिल में उपासना करो'। यह कुंभ समारोह आगम शास्त्र के अनुसार होता है। इसमें पूजा कैसे हो और किस प्रकार की हो, इसका मार्गदर्शन है। मंदिरों में हजारों वर्षों से इसी के अनुसार पूजा की जाती है। एक बात हमें समझनी चाहिए, कि पूजा पद्धति और उपासना अलग-अलग हैं। दि. वे. चंद्रशेखर शिवाचार्यर नामक पंडित ने मत व्यक्त किया है, कि हम परमेश्वर की उपासना करते है वह किसी भी भाषा में हो सकती है। लेकिन पूजा पद्धति के कुछ नियम है और उनका पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने यह जानकारी भी दी है, कि जिन लोग को मंदिर में तमिल में पूजा करना चाहते हैं उनके लिए पूजारी को तमिल में पूजा करवाने का नियम है। लेकिन 99% लोग तमिल में पूजा करने के लिए नहीं कहते हैं; वे संस्कृत की मांग करते है।
संस्कृत की ओर से मत रखनेवालों की एक और आपत्ति है, कि बृहदेश्वर मंदिर में तमिल को सम्मान मिलें इसके लिए कमर कसनेवाले सारे लोग नास्तिक है। तमिल के लिए मैदान में उतरनेवाले सारे लोग भगवान को नकारनेवाले हैं। लोग ईश्वर में विश्वास करते हैं और भाषा उनका अधिकार है। लेकिन इन दोनों को रौंदकर ये लोग अपनी ही सही करवाने का प्रयास कर रहे हैं। इस का मतलब है, कुछ नेता और प्रसिद्धी के लिए बेताब होनेवाले कुछ तमिल आंदोलक तिल का ताड़ बना रहे है। 
उच्च न्यायालय ने इस विवाद को चाय की प्याली में उभरा हुआ तूफान बना  दिया। लेकिन इससे एक और बात स्पष्ट होती है। वह है क्षेत्रीय सीमाओं को पार करने की संस्कृत की शक्ति। चोल राजराजा प्रथम वास्तव में सम्राट थे। उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों, श्रीलंका, मालदीव और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों पर उसने सन 985 और 1014 के बीच शासन किया। राजराजा चोल ने जब बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण किया, तो उसका राज्य वर्तमान तमिलनाडु, केरल, आंध्र, कर्नाटक और ओडिशा तक फैला था। उसके पुत्र राजेंद्र चोल ने तो बंगाल में भी अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। यानी यह राजा केवल तमिल लोगों पर नहीं बल्कि करोड़ों गैर – तमिल लोगों पर राज्य करता था। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इन सबसे संवाद करने के लिए चोल राजाओं को संस्कृत भाषा सही लगी! एक तरह से संस्कृत उनके लिए राष्ट्रीय भाषा थी और इसलिए उनके समय से ही इस मंदिर में संस्कृत मंत्रपठन जारी है। न्यायालय ने इस मामले का संज्ञान लिया और तमिल की गरिमा को ध्यान में रखते हुए दोनों भाषाओं में समारोह करने की अनुमति दी। इस बहाने कूपमंडूकों का कुंभाभिषेकम तो टल गया, इतना काफी है!